राजगीर इस जगत का छोटा सुंदर सा टुकड़ा है। इसे अपनी जागीर समझने वाले कई आए और यहां की मिट्टी में दफन हो गए। इतिहास की कब्रगाह है राजगीर। कब्रगाह कहना उचित नहीं होगा क्योंकि हड़प्पा, मोहनजीदारो जैसी सभ्यताओं की तरह यह कभी मृत नहीं हुई चाहे जितने ही प्रयत्न इसे नष्ट करने के हुए हों। देव संयोग से इसकी निरंतरता आज तक बनी रही। इसके झरने कभी सूखे नहीं। गृधकुट, वैभवगिरी, विपुलगिति, उदयगिरी, रत्नागिरी, स्वर्णगिरी, गिरिव्रज पर्वतों की घाटी में चिड़ियों की सुरीली तान आज भी विराजमान है - वेणु (बांस) वन में, पांडु पोखर में, वैतरणी की धार में (गर्म कुंड के पानी से निर्मित नदी), जय प्रकाश उद्यान में, विश्व की पुरानतम सोन भंडार की गुफाओं में, जरासंध के अखाड़े में, जेठियन के बौद्ध विहार में और तपोवन में। यहां जितने तप्त कुंड हैं उतने ही शीतल भी। जीवन हर रूप में प्रवाहमान। गंगा जी की धार की तरह गंगोत्री से नहीं उतरी। यहीं की मिट्टी में जन्म लेकर इसे निखारने में ही सुख गई। वैदिक श्रोत कहते हैं मगध क्षेत्र के चार ही स्थान को पुण्य हैं उनमें राजगीर भी एक है --"मगधेशु गया पुण्या पुण्यम राजगृहम वनम्
च्यवनाश्याश्रम पुण्यम नदी पुण्या पुनः पुना।"
उपरोक्त चारों धामों की महिमा अपरंपार रही होगी। जड़ें इतनी गहरी रही होंगी पुण्यवती होने का पदवी देना पड़ा होगा। दुनिया को पहला गणतंत्र देने वाला अगर वैशाली है तो राजतंत्र का पहला बीज मगध के राजगीर में ही प्रस्फुटित हुए। राजगीर नाम से ही इतिहास की कई उलझने मन में उफान लेने लगती है। कई सभ्यताओं की तस्वीरें उकेरने लगती हैं। महाभारत के वसु और उनकी संतति जरासंध गद्दा लेकर भीम से लड़ते नजर आने लगते हैं। भगवान बुद्ध विशुद्ध शांत मुद्रा में सत्य, अहिंसा और अस्तेय के ज्ञान रूपी सागर में डुबकी लगाने का दृश्य उपस्थित करने लगते। भगवान महावीर के जन्म और कैवल्य की प्राप्ति की कहानी की गूंज नालंदा के कुंडलपुर, पावापुरी से लेकर राजगीर के पूरे विपुलांचल पर्वत घाटी में किसी निर्झर झरने की तरह आज भी सुनाई देती है।
इतिहास के मामले में राजगीर का आकाश इतना विस्तृत है की इसके ओर छोर का पता नहीं चलता। वैदिक और उत्तर वैदिक काल के महाराज वसु, जो भगवान ब्रह्मा के परपौत्र माने जाते हैं, की राजधानी यहां थी जिसके चलते इसका प्रारंभिक नाम वसुपुर पड़ा। उनके द्वारा कराए गए यज्ञ में भाग लेने इतने देवता जुटे की नहाने की व्यवस्था के तौर पर यहां 22 कुंड और 52 धाराएं ब्रह्मा जी के द्वारा बहाए गए जो आज भी प्रवाहमान हैं। उसी यज्ञ में भाग लेने महाराष्ट्र के पंडितों के शुद्तम गोत्र को व्जाप्ता आमंत्रण पत्र भेजकर बुलाया गया जो उपाध्याय ब्राह्मण के तौर पर यहां आज भी कुंड और पर्यटकों को नहाने से पहले उन्हें मंत्र देते हैं। माननीय उच्च न्यायालय ने इनका आधिपत्य कुंड पर बहाल रखा है । अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए आज भी उपाध्याय समाज की शादी आपस में की जाती है जैसा की सूचना दी गई। पंडा समिति सर्वोच्च है। राम प्रवेश उपाध्याय जी केयरटेकर के सौजन्य से हमलोगों ने अच्छा स्नान किया। केयरटेकर से ज्यादा परफेक्ट गाइड की तरह हैं। ऐसी ऐसी सूचना इनके पास है जो शायद ही कोई जानता हो। जैसे की बांसुरिया बाबा की कहानी। बांसुरिया बाबा कुंड पर ही पहाड़ी के रास्ते के एक ओर माता का मंदिर में ही निवास करते थे। रोज़ अपना खून चढ़ाया करते थे। किसी का दुख दर्द कुंड का ही कोई पत्थर रगड़ कर सब ठीक कर दिया करते थे। लेकिन लगभग 20 साल पहले उनका कुंडवासी से बैकुंठवासी हो गए। लेकिन मंदिर आज भी है। लोग नहाने के चक्कर में कुंड क्षेत्र की बेमिसाल इतिहास से नहीं जुड़ पाते। अन्यथा यहां से 560 सीढ़ी ऊपर जाने पर शिव जी का अति रमणीक मंदिर भी है। उसके अलावे कई जैन मंदिर भी हैं। लेकिन सीढ़ी का रास्ता 4 बजे शाम तक ही खुला रहता है। उसी रास्ते में जरासंध का एक बैठका भी है। शायद इसी जगह पर भगवान बुद्ध भी प्रवचन दिया करते थे। पीपल्लवन नाम था स्थान का। पीपल का पेड़ भी हुआ करता था। बहरहाल कुंड स्नान करने से हमारी पूरी थकान छू मंतर हो गई। ऊपर से इसका पानी पीने से बदहजमी और पेट की सारी बीमारियां दूर हो जाना बताई जाती है। ऐसे पर्यटक भी दिखे जो पानी का सेवन अपने घुटने की बीमारी के लिए कर रहे थे। शिमला से एक पर्यटक अपने पीठ दर्द के लिए आए हुए थे। इन गर्म कुंड के जल से बनी धारा का नाम वैतरणी नदी है जिसका स्नान मलमास माह में लोग करके अगले जन्म का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इन्ही महाराज वसु की संतति बृहद्रथ और उनके पुत्र जरासंध से कृष्ण के संरक्षण में मल्ल युद्ध हुआ था जिसमे भीम ने जरासंध के दो फाड़ करके अलग अलग फेंक दिए थे। जरासंध कंस का स्वसूर था और इस मामले में कृष्ण जी के परिजनों में से एक था। इसी राजगृह वासी मगध सम्राट जरासंध के आतंक से कृष्ण को बलराम के साथ द्वारका तक भागने की नौबत आन पड़ी थी जिसके चलते वे रणछोड़ कहलाए। भगवान की लीलाएं अनंत रही हैं। उसके आगे चलते हैं तो बिम्बिसार राजगृह का राजा बना और उसका पुत्र अजातशत्रु उसे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन बैठा था। बिम्बिसार ने यह इच्छा जताई थी की उसे गृद्धकूट पर्वत के शिखर पर रखा जाय जहां से वे भगवान बुद्ध की यात्राओं को देख सकें। बिम्बिसार भगवान बुद्ध को राजगृह में आमंत्रित करने जेठियन तक गया था जो यहां से ज्यादा दूर नहीं है। मात्र बीस किलोमीटर की परिधि के ही अंदर है। इसी जेठियन में भगवान बुद्ध बोध गया से ज्ञान प्राप्त कर यहां ठहरे थे। इसी जेठियन में सूरथ जयसेन नामक भारी विद्वान रहा करता था जिसके यहां ह्यूएन त्सांग जाकर पहले छह माह तक पढ़ा जिसके बाद ही वह नालंदा विश्वविद्यालय गया था। जयसेन को हर्षवर्धन के कई प्रलोभन मिले मगर वह यहां से नहीं हिले। इस स्थान की जरूर कोई महिमा रही होगी जिसका स्पंदन आज भी मौजूद है। यहां पास में अवस्थित तपोवन में गर्म पानी का कुंड है और पैमार नदी की एक धार भी। राजगीर पहुंचने पर इन सभी जगहों को याद करना और दर्शन करना लाजमी है। अजातशत्रु और उसके पुत्र उदयन के काल में राजगृह से मगध की राजधानी पाटलिपुत्र की ओर शिफ्ट हुई। बाद में नंद साम्राज्य और नंद के बाद चंद्रगुप्त मौर्य और राजा अशोक का काल प्रारंभ हुआ। फिर गुप्त साम्राज्य , पाल और मौखरी और सेन राजाओं के काल में बिहार शरीफ या ओडंडपुरी पुनः प्रकाश में आई। विज्ञान के विकास के साथ धर्म पनपने लगा। धर्मों की धराएं सतह पर जितनी शीतल उतनी तल में उष्णता से भरपूर। इसकी अग्नि में मगध साम्राज्य और पूरा नालंदा वर्षों तक जलता रहा। जर्मनी के टंगस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अमिया बताते हैं की दुनिया में बिहार एकांगी ऐसा प्रदेश है जहां चार धर्मों का प्रस्फुटन हुआ - बौद्ध, जैन, वैष्णव और सिख पंथ।
मगध साम्राज्य और तत्कालीन सभ्यता की गहराई में अभी आप उतर रहे होंगे की अचानक फरसा और भाला के साथ अताताइयों का आक्रमण बुद्धत्व और नालंदा विश्वविद्यालय पर हो जाता है और यहां की शांति भंग हो जाती है।। देव और असुरों के लिए नालंदा कुरुक्षेत्र के मैदान की तरह था। जितनी बार नालंदा विश्वविद्यालय तथा बुद्धों को मारने के क्रूर यत्न किए गए उतनी ही बार इसे बचाने की। पुष्यमित्र शुंग महाराज द्वारा जो हानि पहुंचाई गई उसे गुप्त साम्राज्य ने दो गुने उत्साह से मरमत कराई और इसके वैभव को विश्व स्तर पर स्थापित किया , फिर यह विश्वविद्यालय बंगाल के गौड़ राजा शशांक के आंधी और तूफान से नष्ट हो गया मगर हर्षवर्धन ने इसे पुनर्स्थापित कर दिया। मगर सन् 1193 में बख्तियार खिलजी ने जो आतंक मचाया उसके बाद नालंदा किताब के पन्नों पर स्याह धब्बे मात्र रह गया। नालंदा का ये खंडहर और खंडहर में मौजूद किस्सों की अनगिनत जीवित लाशें अपनी कहानियां आज भी सुनाती हैं। कुछ कहानियां अपने राजगीर प्रवास के दौरान मैंने भी बटोरे। एक बार की बात है। बख्तियार बीमार पड़ा और उसके द्वारा पालित सभी डॉक्टर उसे ठीक करने में असफल रहे। तब जाकर राहुल आर्य नामक आयुर्वेद के जानकार नालंदा विश्वविद्यालय से बुलाए गए जिनकी बड़ी ख्याति थी। बख्तियार ने यह शर्त रखी की वह कोई दवाई नहीं लेगा। राहुल ने शर्त मान ली। राहुल वैद्य ने शर्त रखी की बख्तियार को रोज पुण्य कुरान की कुछ आयतें स्वयं पढ़नी होगी और Qur'an की पुस्तक राहुल वैद्य ही लाकर देंगे। जैसे जैसे बख्तियार कुरान पढ़ता गया उसकी तबियत ठीक होती गई। बाद में उसे जानकारी मिली की कुरान के पृष्ठ पर दवा का लेपन कर दिया गया था जो पृष्ठ के पलटने के क्रम में उंगली के मुंह में जाने से असर करती रही। नालंदा के इस ज्ञान को अनुभव कर कोई भी व्यक्ति उस पर हमला नहीं कर सकता ऐसा मेरा मानना है। मगर किस्सा है की उसने ईर्ष्या वश ऐसा किया था।
एक और किस्सा भी है - दो दरिद्र सन्यासी विश्वविद्यालय के कुछ उदंड नए बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गंदे पानी फेंके जाने से कुपित होकर बाहर निकले और 12 वर्ष तक सूर्य भगवान की तपस्या करने के उपरांत यज्ञ अनुष्ठान का संपादन किए और उस यज्ञ कुंड से निकली अग्नि और राख को विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के ऊपर फेंका गया जिससे वहां के एक पुस्तकालय में आग लग गई जिसे बाद में बुझाया गया। नालंदा विश्वविद्यालय के पास ही बडगाम का सूर्य मंदिर भी है जहां छठ के मौके पर भारी भीड़ होती है। संभव है ये उन दोनो दरिद्र ब्राह्मणों की तपस्थली रही हो। कहते हैं की बख्तियार का प्रहार इतना तेज था और उसने नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के बीच ऐसा कतले आम मचाया की वहां उपलब्ध पुस्तकों को पढ़ने वाला कोई बौद्ध या विद्वान नहीं बचा था। बिहारशरीफ जो उडंडपुरी के नाम से पाल और बाद में सेन वंशियों की राजधानी रही वहां के राजाओं ने तमाशे का आनंद उठाया और कुछ ने तो बर्बादी की तरकीबें तक बताई और बाद में बख्तियार के हवा में सदा के लिए उड़ गए। ऐसी नृशंश हत्या, अपराध और क्रूरता इतिहास में शायद नाजियों के द्वारा ही दुहराया गया हो। पूरी सभ्यता कब्रगाह में तब्दील हो गई। एक मोती भी न बचा। नालंदा के बचे हुए विद्वान तिब्बत भाग गए। तिब्बत इस रूप में दूसरी नालंदा के रूप में देखा जाना चाहिए जो इसका एक्सटेंशन ब्रांच बना। भगवान बुद्ध की सत्य और अहिंसा इस क्रूरता की आग में झुलस गई। बौद्धों के शव मौत के इस सागर में बहते नजर आए। बुद्ध जिन्होंने अंगुलिमाल डाकू का समर्पण कराया उनके सत्य अहिंसा भरे धर्म का अंतिम संस्कार कर दिया गया। सत्य अपमानित हुआ और अहिंसा पराजित हुई। कई बार। जरासंध के आतंक के आगे भगवान कृष्ण तक रण छोड़ दिए और मथुरा से द्वारका प्रस्थान कर गए। मगध जरासंध की मृत्यु के बाद सहदेव यहां का शासक बना जो पांडवों का साथी बना और उसके आगे की संतति में दंड और दंडधर भाइयों द्वारा शासित हुआ। दंड ने उदंडपुरी राजधानी बनाई जो अब बिहार शरीफ कहलाता है। सीता की चाह में स्वंवर में भाग लेने जनकपुर जानेवालों में वह भी एक था। मगर दाल नहीं गली थी। बाद में भीम के हाथों मारा गया था।
इतिहास के आकाश से अब भूगोल की जमीन पर उतरते हैं। राजगृह सच मायने में टापू है। इसके गिरी पर्वत श्रृंखलाओं के दोनो ओर नदियों का जाल है जो वर्तमान झारखंड या गया की गुरूपा पहाड़ियों से निः सृत होकर मोकामा में टाल क्षेत्र या झील क्षेत्र बनाती हैं।
हजारीबाग के पठार और पर्वत से जन्म लेने वाले अनेकों नदियां में सबसे पुण्यतम फल्गु नदी है जो अंतः सलिला स्वरूप में विख्यात है। लीलाजन/निरंजना तथा मोहाने नदियों के गठजोड़ से फलदायनी फल्गु नदी का आविर्भाव होता है जो जमीन से अधिक बालुका राशि के नीचे से ही गया में बहती है और पुण्यात्माओं को शांति प्रदान करती है। फल्गु नदी आगे चलकर वजीरगंज और घोसी थाने से बराबर की पहाड़ियों तक में इतनी शाखाओं में विभक्त हो जाती हैं की मूल धारा का ही अस्तित्व नहीं रह जाता है। नालंदा जिला में विभिन्न जगहों में बहनेवाली जलवार, बगही, चिरैया, भूतही, महतमैन, लोकाइन, कठौतिया, धोबा, सुंड, ढोंढ, मोहना, नोनई आदि सभी इसी मूल नदी की ही शाखाएं हैं। हजारीबाग के ही पर्वत से निः सृत पैमार नदी है जो गया से फल्गु के पूरब चलते हुए राजगीर आती है जो नालंदा आते आते कई धाराओं में बंट जाती है जिसमे इटवा, इटुना और संसी तीन नाम मैं जुटा पाया। ये सारी धाराएं राजगीर के उत्तरी पहाड़ी के पीछे परवलपुर, नुरसराय, इस्लामपुर, चंडी, हिलसा आदि को छूती हरनौत आदि के रास्ते मोकामा ताल क्षेत्र में दम तोड देती है। और पूरब चलें तो गुरुपा पहाड़ी से दो नदियां तिलैया और उससे पूरब धाधर निकलती हैं और राजगीर के दक्षिण नारदीगंज के पास आपस में मिलकर पंचाने नदी को जन्म देती हैं और इसी पँचाने नदी के किनारे पावापुरी , बिहारशरीफ जैसे शहर बसे हैं। नानंद गांव में अभी सैनिक स्कूल की भव्य बिल्डिंग इसी नदी के तट पर बनाई गई है। नारदीगंज के आगे मधुबन गांव और मधुबन की पहाड़ी पड़ती है जहां भी गर्म पानी का स्रोत देखने को मिलती है। इसी मधुबन गांव के पास रजौली के दुबौर घाटी से निः सृत धनार्जे नदी का संगम पंचाने से होता है और वहीं पर घोड़ाकटोरा नाम का गांव है जहां गंगा उद्भव की अति महत्वाकांक्षी योजना पर दिन रात काम चल रहा है। नालंदा पहुंचने के बाद पंचाने न जाने कितने भागों में बंट जाती है जिसकी वजह से पटना रांची रोड तथा राजगीर बिहारशरीफ रोड के बीच कई पुलों को पार करना पड़ता है। इस जानकारी का उद्देश्य इतना ही है की नालंदा में एकमात्र राजगीर ही है जिसका पर्वतीय भूभाग बरसात के समय में सबसे सुरक्षित क्षेत्र रहा है। इसीलिए भगवान बुद्ध और महावीर इस क्षेत्र में वर्षा वास करते रहे। ये संजोग ही है की वर्षा ऋतु में ही हमें भी रहने का यहां मौका मिला। इन सभी नदियों के बीच राजगीर की सात पहाड़ियां अति मनोभावन दृश्य उपस्थित करती हैं जिसके चारों ओर मनुष्यों और जानवर आश्रय पाकर धन्य भागी होते हैं। आज से 2500 साल पहले इससे उपयुक्त कोई जगह Buddhist Council अथवा मगध साम्राज्य की राजधानी अथवा नालंदा विश्वविद्यालय के लिए न रही होगी।
राजगीर आज भी हर राहगीर की पहली पसंद है, हर धर्म के लिए, हर मौसम और पर्यटन के लिए तो ध्रुव तारा। घोड़ा कटोरा एक गांव है जो पंचाने नदी के दाहिने तट पर बसा हुआ है और बाएं तट की ओर की पहाड़ी का नाम गिरिव्रज है जिसके नाम पर गिरियक नाम पड़ा है। इस ओर से जब घोड़ा कटोरा घाटी झील जायेंगे तो ऐसा महसूस होगा की कश्मीर के पहलगाम पहुंच गए। इसी गांव के निवासी राजा जमादार और गिरियक नगर पंचायत के स्टाफ हम सब को लेकर वहां पहुंचे और पहुंचने के बाद जो दृश्य का दर्शन हुआ वह अपूर्व था। माउंट आबू , डाल लेक श्रीनगर, जैसलमेर आदि आदि के sunset point सब इसके अद्वितीय सौंदर्य के आगे फेल लगे। बिल्कुल प्राकृतिक Natural Film City। बरबस अमिताभ और रेखा के अभिनय का सिलसिला आपकी आंखों के आगे नाच उठेगा। खासकर गोधूली में जब भुवन भास्कर घाटी पर अपनी कदम रखते हैं और उनके ओज से झील क्षेत्र आच्छादित हो जाता है। बयान शब्दों से संभव नहीं। चित्र संलग्न कर रहा हूं।
पहाड़ों से नीचे उतरकर नेपुरा ग्राम की और प्रस्थान किए। गांव नहीं तसर सिल्क कारीगरी की राजधानी है। यहां कई पुश्तों से हस्तकर्घा का काम होता आया है। यहां के घरों में लगे हस्तकर्घा बुद्ध के ज़माने के ही प्रतीत होंगे मगर आज भी गतिमान हैं। जगदलपुर, असम, साहेबगंज, चाईबासा, सिंहभूम आदि स्थानों से कोकून 3 रुपैया से 9 रुपैया पीस मंगवाकर ये लोग अपने घर में सूत काटते हैं और इनके हाथ के बने वाराणसी साड़ी दूर दूर के व्यापारी ले जाते हैं। गांव में एक कॉपरेटिव सोसायटी भी है जिसके अध्यक्ष हैं नवीन कुमार ततवा। नवीन के घर हम गए जिस घर में कभी विदेशी नागरिक पर्यटन के दृष्टिकोण से रहे थे। इनका घर देखकर मुझे भी अपने गांव का पुराना घर याद आ गया जिसकी छत ताड़ के पेड़ से बनी बीम पर टिकी होती थी और नीचे का फर्श मिट्टी का हुआ करता था जो पुरे घर को ठंडक का अहसास कराती है। दिनेश ततवा के घर पर हांथ और पैर के इस्तेमाल से लूम चला कर पूरी प्रक्रिया को बारीकी से समझा। Cocoon से शुरू कर एक एक स्टेज के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की गई और सामने देखा गया। दिनेश का उत्साह गजब का था। उसके हाथ और पैर लूम पर इतने तेजी से चलते देखकर आप हतप्रभ रह जायेंगे। लगे हाथ हमलोगों ने कुर्ता के कपड़े देखे और फिर साड़ियों के भी। धागे को डाई कराने और फिनिशिंग कराने भागलपुर जाना पड़ता है। इन दो चीजों की व्यवस्था इस गांव में नहीं है। उद्योग विभाग द्वारा एक केंद्र बनाया गया है जहां बुनकर हस्तकर्घ चलाते दिखे। सब अपनी धुन में। पर्यटन विभाग द्वारा इसे पर्यटक ग्राम का दर्जा दिया गया है। यहां की विरासत को अक्षुण रखी गई है। आप आएंगे तो ऐसा महसूस होगा की सत्तर के दशक में पहुंच गए। यही यहां की खूबसूरती है। एक बार में 9 साड़ी के धागे हस्तकर्घा के ताना (vertically arranged silk thread) और भरनी (horizontal Arrow that criss cross bharna) पर लोड की जाती है। एक एक साड़ी की कीमत 7000 रुपैया बताया गया। कुर्ते का कपड़ा लगभग 700 रुपैया मीटर के हिसाब से। एक मीटर कपड़ा बुनने में लगभग 2 पन कोकून लगते हैं यानी की 160 ककुन या 150 ग्राम सूत लगते हैं। प्रति किलो 2600 रुपैया का सूत खरीदते हैं। ऊपर से 200 रुपैया प्रति मीटर मजदूरी लेते हैं। मजदूरी ही कमाई है। दिनभर में 2.5 मीटर बुन पाते। एक पन में अस्सी ककून होते हैं। वहां कई प्रकार के कपड़े थे। जिस cocoon में कीड़ा अंदर ही मर जाते हैं उनका धागा बहुत महीन होता है जबकि cocoon तोड़कर जिंदा निकल जानेवाले cocoon का धागा मोटा। बगीया गांव साहेबगंज (झारखंड) से इन सब का करीबी रिश्ता है जिनसे संपर्क कर ये cocoon मंगवाते हैं। इतना original सिल्क प्राप्ति का कोई दूसरा स्थान नहीं हो सकता। सिल्क की खासियत है की वह गर्मी में ठंडक और ठंडे में गर्म रखती है। बिल्कुल organic product।
राजगीर रेलवे स्टेशन के पास ही मधु पटेल रहती है जो मशरूम के बीज लैब में टिश्यू कल्चर के द्वारा तैयार करती हैं जिसमे इन्हे 50 प्रतिशत की सब्सिडी लैब बनाने के लिए 2011 में दी गई। कुल खर्च लगभग 15 लाख आया था। यहां पर तैयार मशरूम के बीज यानी spawn को लेने पटना से कस्टमर आते हैं। जब हम वहां पहुंचे थे तो पटना से उषा जी यहां इनका नाम सुनकर आई थीं। इन्होंने spawn lab का भ्रमण कराया । इनकी सोच है की अभी भी मशरूम क्षेत्र में प्रोसेसिंग सेंटर्स खोलने की आवश्यकता है।
नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर के सामने के गांव का नाम सारीलचक है। हो सकता है की बुद्ध के प्रधान शिष्यों में एक सारिपुत्र यहां के रहने वाले हों। यहां 400 महिलाएं 20 जीविका एवं कृषि विभाग के सेल्फ हेल्प ग्रुप के रूप में मशरूम के उत्पादन के लिए समर्पित हैं। हर घर में देखा की मशरूम की खेती का कार्य किया जा रहा है। निरूपा जी यहां village resource person हैं जिनसे सीख लेकर सारे ग्रुप फलित फुलित हो रहे हैं। निरूपा जी ने बताया की मशरूम से जोड़ने का काम कृषि विभाग के जिला कृषि पदाधिकारी श्री सुदामा महतो के काल में हुआ जब श्री संजय कुमार सिंह नालंदा जिला के जिला पदाधिकारी हुआ करते थे। 2011 की वो बातें निरूपा जी एवं ग्रुप के सभी सदस्यों को याद है। रचना पाटिल मैडम डीडीसी का भी नाम ग्रुप के सदस्यों द्वारा सम्मान से लिया जा रहा था। ऐसे सारे पदाधिकारी सचमुच प्रशंशा के पात्र हैं। मधु पटेल जी से spawn लेकर यहां खेती की जाती है। इस मामले में मधु जी एक ब्रांड name की तरह हैं। सृष्टि जी दुर्गा महिला ग्रुप की अध्यक्ष हैं। उन्हें अनुदान नहीं मिल पा रहा था। Bameti के डायरेक्टर साहेब से वहीं से बात कर दी गई। ये चार सौ महिलाओं का फोर्स मशरूम की आर्मी वूमेन से कम नहीं। पूरा गांव मशरूम का कारखाना के तौर पर जाना जाता है। शाम को प्रार्थना वगैरह भी होती है। जीविका से रिवॉल्विंग फंड इन्हे मिला था और आगे भी दरकार है। बाजार से जोड़ने की कोशिश होनी चाहिए थी। तभी उद्यमिता विकसित हो पाएगी और अपने पैर पर खड़ा हो पाएगी। कोशिश जारी रहेगी।
कहानियां कई हैं। मगर कहानियों को सुनने से पेट नहीं भरता। यहां इसका भी इंतजाम है। पास में ही सिलाव है जहां का खाजा विश्वप्रसिद्ध है। सो वहां पहुंचकर हमलोग असली नकली की पहचान में लग गए। संजीव जी का खाजा सबसे उत्तम बताया गया। मॉरीशस में खाद्य व्यंजन प्रदर्शनी में उनका भारी जलवा रहा था। यही पहचान अभी तक बनी हुई है। अन्यथा सभी दुकानों के नाम या तो काली शाह है या कालिका शाह। सिर्फ उनकी दुकान पर मॉरीशस का बोर्ड लगा हुआ है। उनके किचन में जाकर मैदा से तैयार होते व्यंजन को देखा। उनका कहना था की पुरातन काल में एक खाजा में 52 परतें हुआ करती थी और इतना खस्ता की तांबे का एक सिक्का ऊपर से गिराया जाय तो आर पार हो जाता। अब 16 से 20 परतें होती हैं। यहां के पानी में ph value और क्लोरीन की अधिकता इसे स्वादिष्ट बनाती हैं।
राजगीर की उत्तरवारी पर्वत श्रृंखला के पीछे ही परवलपुर प्रखंड है जहां पर निश्चलगंज का पूनावाला का पेड़ा मशहूर है। गजब की स्वाद से भरपूर। कभी एकंगरसराय के रास्ते से आना जाना हो तो इसका रसास्वादन करना स्वाभाविक होगा। यहीं पास में उडुंबरिका बौद्ध आश्रम है जहां से कहा जाता है की भगवान बुद्ध आकाश मार्ग से राजगृह गए थे। यही जगह औंगारी सूर्य धाम के तौर पर आज भी लाखों की भीड़ छठ के समय खींच लेती है।
रोचक तथ्यों से भरपूर नालंदा कभी सोया नहीं। नदियों के जाल घुंघराले बाल की तरह एक दूसरे से उलझे हुए हैं। गांव के नाम मछलियों के नाम पर प्रतीत होते हैं मछरियावां, सिंगरियावां, हिलसा आदि। आलू का उत्पादन का यह प्रमुख केंद्र रहा है। कृषि विभाग से एक सशक्त आलू का FPC यहां बिहार शरीफ में बना है। Gerbera फूलों की खेती राजगीर में की गई है। इस्लामपुर में मगही पान का अनुसंधान केंद्र है। साथ में 1200 पेड़ का आम का सरकारी नर्सरी। मगही पान और सिलाव का खाजा दोनो को GI tagging बिहार सरकार के प्रयत्न से प्राप्त हो चुकी है। निश्चल गंज का पेड़ा का GI tagging नहीं मिला है। उसके लिए प्रयत्न किए जा सकते हैं। नूरसराय में हॉर्टिकल्चर का एक मात्र Agriculture College है। वहां जाने पर प्रिंसिपल P. C चौधरी साहब एवं वैज्ञानिक श्री M. D Ojha साहब से मुलाकात हुई और उद्यान के बारे में नालंदा में हो रहे गतिविधियों की काफी जानकारी प्राप्त हुई। भागन बिगहा, हरनौत में कृषि विज्ञान केंद्र है। वहां एक फूलों के विकास के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के निर्माण का प्रस्ताव है। कार्य जारी है। चंडी में मशरूम का एक उद्यमी हैं जहां बिना AC के ही कूलिंग मेंटेन करने के विधि तैयार की गई है। अभी वहां गया नहीं। जाने की उत्कट इच्छा जरूर है। चंडी में ही vegetables के लिए एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इंडो इजरायल ज्वाइंट वेंचर के तहत में चल रहा है। चंडी जाने पर दोनो के भ्रमण का मौका मिलेगा। नए राजगीर की स्थापना की जा रही है। नालंदा विश्वविद्यालय फिर से अंतराष्ट्रीय सहयोग से चलाया जा रहा है। इसकी भव्य बिल्डिंग का निर्माण कार्य चल रहा है। साथ में स्पोर्ट्स स्टेडियम, फिल्म सिटी आदि आदि। आयुध कारखाना अब पूरी तरह से स्थापित है। नेचर सफारी में स्काईवॉक की धूम मची हुई है। Zoo safari भी तैयार हालत में है।
राजगीर का यह विकास अकस्मात नहीं है। यहां का इतिहास और भूगोल मिलकर विकास की शमां बांधते हैं। गया जाने का नया मार्ग बन जाने से अब दूरी काफी कम हो गई है। दोनो ज्वाइंट सिटी के तौर पर विकसित हो रहे हैं। इनके बीच पहाड़ तोड़ श्री दशरथ मांझी का भी पहाड़ आता है जिसे देख कर हर पर्यटक ऊर्जा से भर जाता है। आजं का राजगीर बदला हुआ सा है। सब कुछ गतिमान। लोग एक पर्यटक स्थल से दूसरे पर भागते नजर आते हैं। चेहरा और चरित्र में चमक आ गई है। इसलिए यहां आने में जल्दी करने की कोई जरूरत नहीं। लेकिन जब आएं तो यहां के पत्थरों की परत को पढ़ने का समय हो, पर्वतों से उगते और पहाड़ों से डूबते सूरज को देखने की फुरसत हो। यह सफर यहीं तक। शुक्रिया। जय हिंद जय बिहार
-शैलेंद्र-










