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Wednesday, April 20, 2022

अभयपुर कजरा की यात्रा चालीस साल की यादों का प्रसंग

जैसे जैसे शहर पार करता गया हल्कापन बढ़ता गया। जैसे सात हाथी का बोझ सर पर लेकर घूम रहे हों और अचानक से बोझ नीचे रख दिया गया हो। शहर की हवा में चिंता की आद्रता घुली होती है। इस भारीपन का अहसास हरेक शहरी को होता है। आम हो या खास। पता तब चलता है जब हम शहर छोड़ते हैं। हमारी यात्रा का प्रसंग बचपन की यादों से जुड़ा है जब हम अभयपुर कजरा की पहाड़ी के नीचे बसे घोसैठ गांव में रहा करते थे। चालीस साल हो गए। समय की सीढ़ी एक्सीलरेटर जैसी है। कब पहुंच गए पता ही नहीं चला। चिकनी सड़क और चहुं ओर बिजली का नजारा नया था। मगर उससे भी नया था वो पहाड़ का नैसर्गिक दृश्य। जहां छुट्टियों में दौड़ दौड़ कर जाया करता था। लक्ष्मण कुंड का शीतल जल। उसकी छोटी पहाड़ी की चोटी पर चढ़कर एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा अहसास किया करता था।


 बीच के काल में इन वादियों में जाना संभव नहीं था। उग्रवाद की छाया घनघोर थी। मगर अब विकास की रौशनी में छाया छंट चुकी थी। सो एक बार फिर कुंड देखने का अवसर मिला।


 पहाड़ी पर बने शिव पार्वती और हनुमान जी के मंदिर के दर्शन भी प्राप्त हुए। 

 इतनी सुनसान जगह। बिल्कुल साधना स्थली की तरह। 


साधना स्थली




 एक आदमी का भी अता पता नहीं। बस हम ही हम थे। पास में सालो सिंह और वीरेंद्र जी का आम का बगीचा फिर से लह लहाने लगा है। मंजर से भरपूर। यहां से दो किलोमीटर दूर भगवती स्थान भी दर्शन का मौका मिल गया जहां एक सौ इकावन फीट ऊंची इमारत बनाने के संकल्प की उद्घोषणा की जा रही थी। पास में एक कुआं गहरा था जिसका जल गजब का साफ , निर्मल और शीतल। इतने दिनो के बाद कूप का दर्शन। कुआं के ऊपर लगा चरखा जिससे लगी रस्सी और रस्सी से लगी बाल्टी। दनादन एक एक कर हम सब ने पानी निकाली और पैर हाथ धोए। सामने माता का दर्शन और पास में खड़ा पीपल और बरगद का संयुक्त पेड़ जिसके नीचे मनोकामना चबूतरा के नीचे बैठ कर सुस्ताने का मौका। वर्षों की यादें झरने की तरह बहने लगीं। वापस घर पर और घोसैठ / लोषघानी के मित्रों से आत्मीय मुलाकात। पुराने स्कूल और अभयपुर स्टेशन सब कुछ देखा। पिरी बाजार की रौनक आज भी भरपूर है। आपके हमारे रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो परवल और नेनुवा खाने को मिले उसका स्वाद तो और भी अभूतपूर्व था। बिल्कुल कल्पनातीत। एक अंतर जरूर था। अब कुली गाड़ी नहीं चलती जो कभी यहां से मुंगेर जमालपुर जाने का एक मात्र विकल्प हुआ करती थी। कभी हम नीलम टॉकीज मुंगेर में मजबूर सिनेमा देखने सन 1983 में गए थे। कुली गाड़ी से। छाया स्टूडियो में फोटो भी खिंचवाया था। इसके अतिरिक्त बाबा धाम की यात्रा के लिए इसी रास्ते हम सब कांवर लेकर सुल्तानगंज तक रेलगाड़ी से पहुंचते थे। घंटों स्टेशन पर बैठकर यादों में डूबा रहा। यहां का रेलवे स्टेशन का सन्नाटा दो चार घंटे पर आनेवाले/गुजरने वाले रेल से ही टूटता है अन्यथा इसे किसी साधना स्थली की तरह ही समझिए। उत्तर की ओर का बाजार सूर्यास्त के साथ सुनसान हो जाता है और दक्षिण दिशा में स्टेशन से सटे पहाड़ी है जो पूरे स्टेशन के माहौल को नैसर्गिक सौंदर्य में तब्दील कर देती है। चार दिनों की यह छुट्टी का अच्छा उपभोग करने का मौका मिला। इससे बेहतर समय नहीं गुजरा जा सकता था। भूले बिछड़े संबंधों के प्रेम की वर्षा से ओत प्रोत हो गया। ऐसे ही भींगते भींगाते वापस शहर की ओर चल पड़े । अपने काम पर। शहर का दवाब पीछा नहीं छोड़ता। पापी पेट का सवाल विकराल है। यहां बिताए पलों को कैमरे में भी कैद किया गया है जिसे नीचे के भाग पर अवलोकन के लिया रक्षित कर रहा हूं। उम्मीद है आपको अच्छा लगेगा। फिर मिलेंगे। जय हिंद जय बिहार